Page 42 - E-Patrika 5th English Edition
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ै
                       पहचान दी नह  जाती, बनाई जाती ह....


                                                       एक  पता थे।
                                        जसक े  नाम पर हम अपनी पहचान दु नया को बताते थे।
                                     लोग मुझे मेरे नाम से कम, और उनक े  नाम से ज़्यादा जानते थे।
                                                                    ै
                                                  “अरे… ये उनका बेटा ह…”
                                           बस इतना सुनते ही सीना गव  से भर जाता था।
                                              मुझे लगता था मेर  पहचान बन चुक  ह।
                                                                           ै
                                           पर सच तो ये था… ‘मेर  पहचान मेर  नह  थी’

                                                फर एक  दन… वो  पता मर गये।
                                                 लोग घर आए, रोए, समझाए…

                                           पर मुझे सबसे ज़्यादा डर एक सवाल से लगा,
                                                                        ँ
                                              अब म अपनी पहचान कसे करवाऊगा?

                                                                ै
                                                                       ै
                                              अब कौन कहेगा “ये उसका बेटा ह…”?
                                           अब कौन मेरे नाम क े  आगे उनका नाम जोड़ेगा?
                                               क ु छ  दना  बाद मुझे समझ आया -
                                             वो  पता नह  मरे, मेर  पहचान मर गइ थी।

                                         जो एक समय मेर  खुद क  पहचान क  वजह बनी थी,
                                               आज वही मेर  कमजोर  बन चुक  थी।

                                                 म रोज़ रात को फोन उठाता…

                                         ै
                                     कॉन्टक्ट  लस्ट खोलता… और उगली रुक जाती एक नाम पर,
                                                              ं
                                                          “पापा”
                                                            ँ
                                         दल करता था बस बोल   - “हे  सर … कॉल टू पापा”
                                                   पर  सर  भी क्या करती…
                                        नबर तो लग जाता, पर आवाज़ कभी वापस नह  आती।
                                        ं

                                           एक रात म बहुत रोया। और  फर खुद से कहा,
                                          “जब तक म  सफ उनका बेटा बन क े  जीता र गा,

                                                                             ँ

                                                 तब तक वो सच म  मर चुक े  हा गे।
                                                                          ँ

                                             पर  जस  दन म अपनी पहचान बना लूगा,
                                                     उस  दन लोग कह गे -
                                                         ै
                                        ‘ये उस बाप का बेटा ह…  जसने एेसा बेटा पदा  कया’
                                                                          ै
                                                  उस  दन मुझे समझ आया -

                                           बाप कभी नह  मरते। वो  सफ  ज़म्मेदार  बनकर

                                                  बेटे क े  कधा  पर आ जाते ह।
                                                        ं
                                                                 ै
                                         आज जब कोइ मेरा नाम लेता ह, म मुस्क ु रा देता  ।

                                                                                ँ


                                                                                 ँ

                                        क्या  क अब म  सफ उनका बेटा नह … उनका सपना  ।
                                                                            ै

                                            और हर बार जब  ज़दगी मु  कल होती ह,
                                                                            ँ
                                            म धीरे से फोन क  तरफ देखकर कहता   -

                                                  “हे  सर … कॉल टू पापा…”
                                                            ं
                                                                    ँ
                                                    फर आख  बद करता  …
                                                         ँ
                                                                            ै
                                                                 ं
                                             और उनक  आवाज़ कह  अदर से आती ह -
                                                                                  ै

                                    “बेटा… पहचान दी नह  जाती, बनाइ जाती ह।”
                                          Divyesh J. Dhangar
                                                DKY, PTC VADODARA
                                                           33
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